18/06/2015

कुछ तो हूँ मैं

एक चाह थी एक राह थी
एक सपने की दुनियां गवाह थी
एक जोश था दिल मदहोश था
एक ख़्वाब जब न खामोश था
वह बात क्या सच में हुई है
की बदलावों ने ही दुनिया रची है
फिर क्यों मैंने यही सुना है
सदैव मुझे लोगों में ढालना है
क्या हो अगर मैं ऐसा न करना चाहूँ
क्या होगा अगर मैं इन उसूलों को झुठलाऊं
या फिर कही और उड़ जाऊं
किसी नई जगह पर अपना घर बनाऊं
लेकिन कौन जाने वहाँ हालात अलग होंगे
कौन जाने वहां मुश्किलें कम होंगे
एक चीख न बहार आ पाती है
एक उम्मीद कहीं गुम हो जाती है
एक चिंगारी भी न नज़र आती है 
एक बूंद प्यार की प्यासी रह जाती है 
कुछ तो हूँ मैं यह बात सुनी थी
खुद को फिर ताकत मिली थी
मन में फिर एक लौ जाली है
समझ यह आने में भले ही देर हुई है
अनूठा अनोखा असंभव फिर कुछ करना चाहूँ
रंगो भरा अपना बगियारा मैं खुद सजायूं
ताकत और हौसला आए न आए
हिम्मत और जोश का साथ मैंने है पाए
मत करो मजबूर खुद को उसूलों की बेड़ियों में
जब आराम से चढ़ सकते हो सपनों की सीढ़ियों पे
न मानो हार और बस कर के दिखाओ
अब है वह मौका जब अपना भविष्य तुम खुद बनाओ
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